
Saturday, December 18, 2010
Friday, August 27, 2010
'खुदी'
Saturday, August 7, 2010
'विध्वंशक'
'मिट्टी की मूरत'
Wednesday, August 4, 2010
..........
कोई किसी की आवाज सुन ले तो उसका मौसम बदल जाता है।
और एक वो है की उस आवाज का भी मोल लगाता है।
वो बिन सुने भी उसे महसूस कर सकता है।
और एक वो है जो महसूस करके भी अनसुना कर जाता है।
ये क्या है जो.........
बेपर्दा होते हुए भी एक पर्दे मे सिमट के रह जाता है।
और एक वो है की उस आवाज का भी मोल लगाता है।
वो बिन सुने भी उसे महसूस कर सकता है।
और एक वो है जो महसूस करके भी अनसुना कर जाता है।
ये क्या है जो.........
बेपर्दा होते हुए भी एक पर्दे मे सिमट के रह जाता है।
Monday, August 2, 2010
समर्पण

तुमने सोचा,
कभी हम ऐसा कह जाते है मानो
चोटी हमारे हाथो को छू रही है ।
पर वो तो एक चेहरा था उसका,
सच्चाई तो हमसे आँख मिचौली कर रही है
आगे की कहानी कुछ अलग ही कह रही है।
जो अनकहा है, शब्दों से परे है
किसी के समर्पण की कहानी बह रही है।
सच्चाई हमसे आँख मिचौली कर रही है।
जो रुकना नहीं जानती ,
बस चलती जा रही है
किसी न किसी के प्यार की प्यास बुझती जा रही है।
बिन कहे, बिन सुने, शब्दों से परे
किसी की समर्पण की कहानी बह रही है।
सच्चाई हमसे आँख मिचौली कर रही है।
न कुछ पूछा, न हमने कुछ बताया ,
न जाने क्या है उसमे........
अनजानी सी लहर आ रही है।
किसी के समर्पण की कहानी बह रही है।
सच्चाई हमसे आँख मिचौली कर रही है।
वो चोटी अब हमसे दूर......
उस समर्पण के पास निखर रही है।
सच्चाई हमसे आँख मिचौली कर रही है।
Sunday, August 1, 2010
अभिलाषा

आती है ,
भीनी - भीनी खुशबू लाती है।
साह्स देके जिंदगी मे,
हर नए मोड़ सजाती है ।
ख्वाहिशो के मयान से ,
भावनाओ के बयान से,
उत्कृष्टता के मक़ाम पे पहुचती है ।
ये अभिलाषा है........
सबको आगे बढाती है।
पीछे मुड़ते है जो लोग,
उनकी आकांक्षाये छीण हो चुकी है ।
ये अभिलाषा नहीं........
अभिलाषा तो हर मक़ाम पे बस
चढ़ना सिखाती है।
मंजिल कोई भी हो....
अभिलाषा उसमे उत्तेजना जगती है।
सही है या गलत केवल...
इतनी पहचान नहीं करा पाती है।
ये अभिलाषा है,
इसलिए कभी
करार नहीं पाती है .........
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