Thursday, June 24, 2010

'धागा'



एक धागा कुछ मोतियों को पिरोता है
उनको उनके अक्स में भिगोता है।

लाता है अस्तित्व में उनको
बनता है, सवारता है,
और फिर...
एक धागा कुछ मोतियों को पिरोता है।

जाने क्या चाहता है,
एक खुबसूरत स्वरुप दिखाता है,
मोतियों को समझाता है,
की उनमे क्या है , जानता है।
कुछ पहचानता है।
कुछ पहचान करता है।
तभी तो....

एक धागा मोती को पिरोता है ।
उनको उनके अक्स में भिगोता है।

Wednesday, May 12, 2010

मेरे लिए .........माँ



मेरे लिए
एक ख्वाब का आगाज हो तुम ।
दुनिया जो सरगम गाती है,
उन सब का बंधा हुआ एक साज हो तुम

आँखों को खोला है तुमने ,
मेरे जिस्म मे जान हो तुम ।
देके जो तुम चली गयी हो
वो जीवन वरदान हो तुम

सासों ने जब तुमसे खेला
हमको तब खेल खिलाया था ।
जीवन की राहो मे चलना
तुमने ही तो सिखलाया था ।

आंधी को बद्लेगे कैसे
सुरख हवा के झोखो मे
बड़ी आसानी से हमको
तुमने
ये बतलाया था।

मैं तो थी एक कोमल लतिका
सीची गयी जब तेरे नीर से
तब बनी हू मै एक कृतिका

अभी थोडा ही तो समय हुआ था
जब मैंने ये सब जाना था
आई ही क्यू आगोश मे तेरे
यू छोड़ के जो तूने जाना था ।

देख के अपने अक्स को तुझमे
तब
तो खुद को पहचाना था
अब तू मुझको ये बतलादे
यू छोड़ के क्यू तुझे जाना था ।

अब जब तुने छोड़ दिया है
साया भी क्या साथ चलेगा ?
फिर सोचा साये का क्या है
तू
तो हम साया बन रूह बसेगा

Friday, April 23, 2010

'जो शाशवत है'


मै जानती हूँ ।
वो हमेशा मेरे साथ है ।
परछाईयाँ जब साथ छोड़े
उस समय मेरे साथ है ।

अज्ञात है जो ,
उसके पीछे हम है चलते ।
जो दिखे,
धोखा कहता ।
जो नहीं ,
विश्वास उस पर क्यू है करता ?

चक्र है वो रोशनी का ।
फैले जहा , विश्वास भरता ।
हो अँधेरा जब दिलो मे ,
एक किरण आरब्ध है वो
छोड़ तिमिरो के वो साये ,
एक नया प्रकाश है वो ।

कौन जानता है उसे 'यहाँ'
फिर भी रुहों से जुडा है।
'साथ खुद का जब हम छोड़े
देख पीछे वो खड़ा है '

Saturday, April 17, 2010

व्योम.


व्योम।
शून्य।
कुछ नहीं होता ।
पर कुछ साकार करता है

जो अनकहा है।
झंझोड़ देता है
जो शांत अचल गंभीर है
स्थिर है शून्य मे अब तक

परदे के पीछे से परदे हटते जा रहे है
उनके कुछ लिखे कुछ अनलिखे शब्दों मे,
व्योम है।

कुछ पता नहीं चलता
क्या कहानी है उसमे छुपी।
वक़्त के हर क्षण की
रवानी है उसमे रुकी,

ठहर गया है सब कुछ
वक़्त को भींचे हुए ,
पर वक़्त चलता जाए
उस व्योम के तले...